
उदासी के क्षणों में
अक्सर आ ही जाती है
पाँव तले परछाई
और चिल्ला पड़ता है मौन
ताकि आत्मा तक
पहुँच सके उसकी पुकार
मैं जो कुछ पल यूँ ही
चलता रहता हूँ
तुम्हारे साथ
सोचता हूँ
तुम अगर मेरे ज़ख्मों पर
अपने अल्फाज़ रख दो
तो गीत गाने लगेगी
मुस्कुराहटें
प्रेम धूप सा
निश्चल है
इच्छाओं की ऊँगली रख कर
इसे मैला ना करो
बोलती आँखों और खामोश होठों की
चलते फिरते पाँव, बंधे हाथ और उदास सायों की
इस वीरान दुनिया में
मैं तुमसे आखिर
और मांग भी क्या सकता हूँ
बस एक चुटकी अपनापन !!
Deep
Deep
चित्र साभार : सौमित्र आनंद
10 comments:
एक चुटकी अपनापन मिल जाए तो ज़िंदगी को कोई शिकायत ही न रहे .. बहुत अच्छी नज़्म
100% poetry
great !
i like it so much.........
अपनेपन की एक आह ही पर्याप्त है।
प्रेम धूप सा
निश्छल है
इच्छाओं की ऊँगली रख कर
इसे मैला ना करो
वाह क्या बात कही है आपने ...प्रेम की पवित्रता को समझना आवश्यक है .....आपका आभार
बहुत ही कोमल भावनाओं में रची-बसी खूबसूरत रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई।
बहुत सुन्दर .. अपनेपन की तो एक बूँद ही बहुत है ........
माशाल्लाह.....
@masi jaan
:) love you
@albela ji
bahut shukriya :)
@praveen ji
sach kaha.. ek aah hi kafi hai. shukriya :)
@kewal ji
wahi samajhne ki ek chhoti si koshish hai ye nazm.. shukriya :)
@Dr Sahiba..
bahut shukriya :)
@Shashi ji
ji, mera bhi yahi maan.na hai.. but you know ye dil maange more ;)
@Sanjay ji
shukriya :)
@kumar ji
:)
प्रेम धूप सा
निश्चल है
इच्छाओं की ऊँगली रख कर
इसे मैला ना करो
bahut achchi nazm hai deep
Bahut khubsoorat..
प्रेम धूप सा
निश्चल है
इच्छाओं की ऊँगली रख कर
इसे मैला ना करो
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