October 26, 2009

Gazal kahuN



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तेरी याद आये तो मैं रो पडूँ, जो मैं रो पडूँ तो ग़ज़ल कहूँ
तेरे दर्द को मैं बहर कहूँ, तेरे पाक मस* को ग़ज़ल कहूँ..
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मेरे घर में है तू बसी हुई, किसी शेय से है तू जुदा नहीं
तुझे खुद से कैसे जुदा करूँ, जो जुदा करूँ तो ग़ज़ल कहूँ..
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मैंने ज़िन्दगी तेरे नाम की, मेरी जीस्त* का हांसिल है तू
तुझे भूलने की दुआ में जो न असर करे वो ग़ज़ल कहूँ..
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मेरे हर्फ़ हर्फ़ ओ मेरा सुखन, तेरे दम से है तुझे क्या पता
तुझे गर शुमार* न कर सकूँ, बता कैसे मैं वो ग़ज़ल कहूँ..
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तेरे बिन सनम जो मैं जी रहा, बड़ा बेवफा, है मेरी सजा
मेरा साथ ना दे जुबां मेरी, मैं ना कह सकूँ, जो ग़ज़ल कहूँ..!!
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* mas : sparsh/ ehsaas
zeest: zindagi
shumaar : shaamil
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Deep

October 15, 2009

Ek image : SMS


रात में जब कभी
जुगनू सा चमक उठता है
फ़ोन
तुम्हारे SMS पर

बिलकुल उसी तरह
जैसे तुम आये हो
मेरी तारीक ज़िन्दगी में
रौशनी की किरण लेकर

मैं तुम्हारे हर एहसास को
अपने होठों पे रख लेती हूँ
और मुस्कुरा देती हूँ
जैसे
तुम्हारे SMS का
मुस्कुराता Smiley [:)]


..
Deep

October 7, 2009

Bidaai



सोचा नहीं था
यूँ छोड़ के जाना होगा
अपने गलियारों से
मुंह मोड़ के जाना होगा
याद कर अपने बचपन के
दिन उछल जाती हूँ
बारिशों की बूंदों से
अब तक मचल जाती हूँ
मेरे बचपन के साथियो
मेरे खिलौनों बताओ
मैं तुमसे दूर कैसे जाऊँ
कोई तो रास्ता सुझाओ...

घर का आँगन अभी भी
दामन थामे खडा है
मैं मुड के देख कर उसे
बिलख बिलख के रो रही हूँ
इसी आँगन में खेलती थी कभी
आज इसी से पराई हुई जाती हूँ॥

माँ मुझ को खुद से
यूँ जुदा न कर
मेरा तेरे बिन गुजारा नहीं
खुदाया ऐसा न कर
बाबा मैं आज भी
आपकी वही नन्ही सी बिटिया हूँ
वही आफत की पुडिया हूँ
वही आँगन की चिडिया हूँ
मेरा दिल चूर-चूर हुआ जाता है
मुझसे सब दूर-दूर हुआ जाता है
कितने नाजो से पाला मुझे तुमने
तो फिर आज यूँ ही पराई कैसे कर दिया??
मैं कैसे कहू और क्या
आँखों में सवाल चिपक गए हैं
जुबान से लफ्ज़ उड़ गए हैं
न कर मुझको बिदा
किसी अजनबी के साथ
न कर मेरी माँ
यह ज़ुल्म मेरे साथ
मैं तेरे बिन कैसे निबाह करुँगी
कैसे जियूंगी
कैसे किसी का घर सवारुंगी
पर हाँ तेरी दी हर सीख याद रखूंगी
मर कर भी
उस अजनबी घर को ख़ुशी से भर दूंगी !!!


..
Deep

September 17, 2009

कितनी रातें रोया कोई,


अम्बर कुछ सीला लगता है,
रोया है? पीला लगता है..

उसने यादों के ज़ख्मों को,
शायद फिर छीला, लगता है..

कितनी रातें रोया कोई,
तकिया भी गीला लगता है..

आँखों में अश्कों का मोती,
कुछ तो चमकीला, लगता है..

देखो गिर के टूटे ना वो,
चन्दा जो ढीला लगता है..

बादल के पीछे से झांके,
कितना शर्मीला लगता है..

'आब' की ग़ज़लों का हर मिसरा
जाने क्यूँ गीला लगता है ..!!


..
Deep

arkaan:
faalun 4 martaba

September 9, 2009

Barsaat


फिर रो रहा है आज आसमाँ टूट कर
फिर आज क़यामत सी बरसात है

फिर आज किसी उम्मीद के चाँद ने
कूद के उफक की छत से
जान दे दी शायद

कितनी शिद्दत से निभाया था
तुमने उस रात अपना वादा
"तुमसे बिछुडी, तो मर ही जाउंगी"...

हर रोज़ वक़्त पे आने का वादा तोड़ती थी
कभी याद नहीं रखा जन्मदिन मेरा
तुमने कितने ही वादों को
कत्ल किया था
खुद अपने ही हाथों..


ऐसा लगता है आज फिर शायद
टूट कर वक़्त के हाथों
कोई वादा निभा गया है कहीं

फिर रो रहा है आज आसमाँ टूट कर
फिर आज क़यामत सी बरसात है...!!


..
Deep

September 2, 2009

लम्स तेरे खूँ से गुज़रते चले गए..!!



हम तुझसे जो टूटे तो बिखरते चले गए,
खुद अपनी ही नज़रों से उतरते चले गए..

फिर यूँ हुआ के जोड़ लिया राबता गम से,
हर दर्द से हम दोस्ती करते चले गए..

गजलें न रास आईं मुझे बाद तेरे फिर,
नज्मों के शौक दिल से उतरते चले गए..

जब यूँ हुआ के याद तेरी फिर उठी दिल में,
चेहरे पे ज़ख्म ए हिज्र उभरते चले गए..

फिर यूँ हुआ के काट डाली नब्ज़ 'आब' ने
और लम्स तेरे खूँ से गुज़रते चले गए..!!

..
-Deep

August 29, 2009

Kuch Haiku

रात पगली
बैठी दरवाज़े पे
किसके लिए?
**********

कुछ खट्टी
कुछ मीठी हैं
तेरी यादें..!!
**********

जहाँ रहो
खुश रहो सदा
दुआ मेरी ..!!
**********

आँखें निचोडें
दिल का पानी
कितना खारा..!!
**********

दिल रोया
आँखें सूखी हैं
जाने कैसे ?

August 10, 2009

Tawaayaf


मेरी उलझी हुई इस जीस्त की गिरह न खोल
ऐसा उलझेगा ना फिर कबहु निकल पायेगा
हाथ अपने तू जला लेगा मेरी खाक में यूँ
कब तलक छाले मेरे दिल के तू सहलाएगा..

मैं नहीं इश्क के काबिल तू मुझसे प्यार ना कर
मान ले बात मेरी वक़्त यूँ बेकार ना कर
मेरी तकदीर में कांटे हैं तो कांटे ही सही
कब तलक गुल को मेरे वास्ते मनायेगा..

मैं बनाई गई ज़रकार* पैराहन की शमा
मेरी इस आंच ने जानूं नहीं कितनों को छला
मुझपे फबता नहीं येः सुर्ख रेशमी जोड़ा
मेरे हाथों में नहीं रंग ए हिना आएगा..

मेरी जुम्बिश मेरी येः शक्ल भी उधार की है
येः रंग ओ नूर अमानत मेरे बाज़ार की है
मैं हसीं बुत हूँ जो नीलाम रोज़ होता है
मुझको रौनक तू घर की कैसे बना पायेगा..

मेरे दामन पे सियाह दाग शब् के काजल का
मुझपे इल्जाम जमाने के काले बादल का
मैं तो बदनाम यूँ ही हूँ मेरे हमदम लेकिन
तुझे भी रुसवा सुबह शाम किया जाएगा..

आखिर अंजाम फ़क़त येः ही मेरी जाँ होगा
बेवजह बाद में तू, यूँ ही पशेमाँ होगा
आज मौका है तेरे पास, छुडा ले दामन
फिर कहीं दोष खुद को देके तू पछतायेगा..

मेरे दामन में कई राज़ छुपे हैं हमदम
मेरा हर रंग ही बदरंग है ओ मेरे सनम
जब उतर जाएगा येः रंग ए जुनूँ सर से तू
मेरी तकदीर की गिरहों सा नज़र आएगा..

इल्तेज़ा मेरी, मेरी जान मान ले येः तू
जो हकीकत है उसे आज जान ले ना तू
मेरी उलझी हुई इस जीस्त की गिरह न खोल
ऐसा उलझेगा ना फिर कबहु निकल पायेगा !!


* sunehri


..
Deep

July 27, 2009

Thand: Intezaar ki


चांदनी का पैराहन
पुराना हो चला है
घिस गया है
रंग भी जा चुका है
कितनी ही रातों
और दिनों को
तड़प के अलाव में
डाल चुकी हूँ
इंतज़ार की ठण्ड है
न जाती है
न कम होती है....


ठण्ड
अब दर्द बन रही है
इस से पहले
कि मैं रूह बचाने को
जिस्म उतार के
अलाव में डाल दूँ
चले आओ....!!


..
Deep

July 12, 2009

ek guzarish baarish ke liye :)


june tadap kar bhaag gayi
july ne karwat badli
maansoon ki chaahat mein
ho li hai duniya pagli

dharti ke chehre par ab to
cheenta de de rabba
dard pyaas ka tham jaaye
jal meetha de de rabba..

kab se aankhein takti hain
nirdayi amber ka chehra
man ke bheetar tak chubhta hai
dhoop ka rang sunehra

ab to nayno.n se mamta ka
neer baha de rabba
apne bacchon par baadal se
jal barsaa de rabba...

saari faslein sookh gayi
har kyaari hai kumhlaai
tere patthar dil mein kyun
ab tak daya nahi aayi

jalti dharti par aanchal se
chhaya kar de rabba
ab boondein barsa sach apni
maaya kar de rabba..!!

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जून तड़प कर भाग गई
जुलाई ने करवट बदली
मानसून की चाहत में
हो ली है दुनिया पगली

धरती के चेहरे पर अब तो
छींटा दे दे रब्बा
दर्द प्यास का थम जाए
जल मीठा दे दे रब्बा.. !

कब से आँखें तकती हैं
निर्दयी अम्बर का चेहरा
मन के भीतर तक चुभता है
धुप का रंग सुनेहरा

अब तो नयनों से ममता का
नीर बहा दे रब्बा
अपने बच्चों पर बादल से
जल बरसा दे रब्बा... !

सारी फसलें सूख गई
हर क्यारी है कुम्हलाई
तेरे पत्थर दिल में क्यूँ
अब तक दया नहीं आई

जलती धरती पर आँचल से
छाया कर दे रब्बा
अब बूँदें बरसा, सच अपनी
माया कर दे रब्बा..!!



..
Deep

April 3, 2009

Raat


Dekho
raat baith ke
aasmaan ke kinaare
latkaa ke pair apne
paayal baja rahi hai
 
jee mein aata hai
aaj
pakad ke iske pair
kheench lun ise
zamee.n par
kaid kar ke rakh lun
 
ki fir kabhi raat ke bahane
tum mujhese door na jao..!
 
------------------------------------
देखो 
रात बैठ के 
आसमां के किनारे
लटका के पैर अपने
पायल बजा रही है
 
जी में आता है
आज 
पकड़ के इसके पैर
खींच लूँ इसे ज़मीं पर
कैद कर के रख लूँ
 
कि फिर कभी रात के बहाने
तुम मुझसे दूर ना जाओ..!

..
Deep

March 15, 2009

Tu


तू एक दुआ था

जो बिन माँगे फल गयी थी

खुदा की यह नेमत

मुझे अज़ीज़ थी बहुत

मगर मैं इस बात से अंजान थी

की तू एक नेमत थी


जब मैने तुझ पर हक़ जताया

वो नेमत मुझसे छीन ली गयी


सच, माँगने पर तो भीख भी नही मिलती


::::::::


तू वो वक़्त है

जो मैने जिया है

जिसने मुझे रुलाया भी

हँसाया भी

मुझे मुझ से मिलाया भी


मगर वक़्त की आदत है बीत जाना


तू वक़्त था॥


::::::::


तू वो रिश्ता है

जो मेरा हमदर्द भी है

हम राज़ भी

जिसकी छाँव में

मैं महफूज़ थी


शायद मुझे ही

रिश्ते संभालना नही आया…


::::::::


तू एक ख्वाब था

ज़िंदगी का

ख़ुशी का


ख्वाब भी कभी

सच हुए हैं भला…


::::::::


तू एक कसक है

याद आता है

तो होंठों पर

ख़ुशी की एक लक़ीर खिच जाती है और

जाते जाते

एक तड़प छोड़ जाता है

तू बस एक कसक बन गया है …।

..

मैं तेरे दोस्त से कहती हूँ

कह दे तुझसे

कि मैं अब नही रही

कि तुझसे जुड़ के ही तो पाई थी

खुद की पहचान मैने

तू जाते जाते

मेरे होने का एहसास भी ले गया

तू मुझे साथ ही ले गया…!!


(कुछ लोग रूह में बस जाते हैं

और जाते जाते

उसे साथ लिए जाते हैं…!)



..

Deep

February 20, 2009

log kehte hain main bewafa ho gayi

ye meri zindagi kya se kya ho gayi
dekhte dekhte haadsaa ho gayi...

muskurayi thi mein to tirii yaad mein
log kehte hain main bewafa ho gayi...

kar diya gair mujhko mere yaar ne
yaad uski mujhse aashna ho gayi...

jab sajane laga tu ghazal ishq ki
bhool kar main jahan kafiya ho gayi..!!.
.
----------------------------------------------------
.

ये मेरी ज़िन्दगी क्या से क्या हो गई
देखते देखते हादसा हो गई...

मुस्कुराई थी मैं तो तिरी याद में
लोग कहते हैं मैं बेवफा हो गई...

कर दिया गैर मुझको मेरे यार ने
याद उसकी मुझसे आशना हो गई...

जब सजाने लगा तू ग़ज़ल इश्क की
भूल कर मैं जहाँ काफिया हो गई..!!
.
.
.
..
Deep

December 29, 2008

saalgirah


roshni ka ghaagra
chaandni ki choli
aasmaa.n ki chunri odhe
meri umeed ki dulhan..

rabba meri chunri mein
chahat ka gota laga de
aur taaro.n se mera
lehnga saja de..

sehar lai hai os ke
jhilmilaate zewar mere liye
suraj ne apne rang ki
bheji hai hina...

saj dhaj ke taiyaar hui jo
meri umeed ki dulhan
kitni nayi naveli si
lagti hai aaj bhi...

aaj ke hi din hum tum mile the
tum nahi to kyamain to saalgirah manaungi...!!
==========================================
रोशनी का घागरा
चाँदनी की चोली
आस्मां की चुनरी ओढ़े
मेरी उम्मीद की दुल्हन..

रब्बा मेरी चुनरी में
चाहत का गोटा लगा दे
और तारों से मेरा
लहंगा सज़ा दे..

सहर लाई है ओस के
झिलमिलाते ज़ेवर मेरे लिए
सूरज ने अपने रंग की
भेजी है हिना...

सज धज के तैयार हुई जो
मेरी उम्मीद की दुल्हन
कितनी नयी नवेली सी
लगती है आज भी...

आज के ही दिन हम तुम मिले थे
तुम नही तो क्या मैं तो सालगिरह मनाउंगी...!!



Deep

nafrat




Nafrat mein bhi pyaar chhupa hota hai


keh ke tum hamesha chidhaate the


jab jab


main gusse mein kehti thi


" i hate u " ...



aaj mujhe tumse koi shikaayat nahi


Nafrat bhi nahi ... !!




Deep


November 29, 2008

main shola thi
tumne chhua
to main shabnam hui
fir tumne mujhe
subah ki taaza os bana
aankho.n pe saja liya
kabhi aab-e-hayaat bana
hotho.n se laga liya
aur jab jee bhar gaya
to paani samajh
thukra diya..
magar
mat bhoolo
ek din
jab meri kami teri zindgi ka
khala ban jaayegi
us roz
isi paani ki ek ek boond ko
teri aankhein taras jaayengi...!!
============================

मैं शोला थी
तुमने छुआ
तो मैं शबनम हुई
फिर तुमने मुझे
सुबह की ताज़ा ओस बना
आँखों पे सज़ा लिया
कभी आब-ए-हयात बना
होठों से लगा लिए
और जब जी भर गया
तो पानी समझ ठुकरा दिया..
मगर

मत भूलो एक दिन
जब मेरी कमी
तेरी ज़िंदगी का खला बन जाएगी
उस रोज़
इसी पानी की
एक एक बूँद को
तेरी आँखें तरस जाएँगी...!!



..Deep

November 14, 2008

yaad..


Almaari ke ik kone mein
Chhupa ke rakha tha
Jo kabhi maine
Teri yaad ka wahi Chhota sa dibba
Kal mujhe dekh kar
Muskura diya
Dil bebasi se fir wahi
Beh chala…

Khol kar dekha to
Kuch khwaab mile
Thodi mulaakaatein
Chand nazme
Aur kuch ghazle…

Ek ghazal haath mein uthaai to
Fisal ke farsh par ja padi
jaise baarsaat mein
bheege ho kuch is tarah
Pair mere bhar gaye
misro'n se
aur fir aankhon se
ghazal ki ley beh chali....

isi liye chupa ke rakthi hu
tumhaari yaad ke har mausam ko
koi bhi safha palat ke dekho
rooh ke jakhm bheeg jaate hain…!!!

================================
अलमारी के एक कोने में
छुपा के रखा था
जो कभी मैने
तेरी याद का
वही छोटा सा डिब्बा
कल मुझे देख कर मुस्कुरा दिया
दिल बेबसी से फिर वही बह चला…

खोल कर देखा तो
कुछ ख्वाब मिले
थोड़ी मुलाक़ातें
चन्द नज्मे और कुछ गजले…

एक गजल
हाथ में उठाई तो
फिसल के फर्श पर जा पड़ी
जैसे बारसात में भीगे हो
कुछ इस तरह
पैर मेरे भर गये
मिसरों से
और फिर आँखों से
गजल की लय बह चली....

इसी लिए छुपा के रखती हूँ
तुम्हारी याद के हर मौसम को
कोई भी सफ़हा पलट के देखो
रूह के जख्म भीग जाते हैं…!!!


..deep

October 27, 2008

nazm

teri humkhayal
humnazar hun main
humraaz hun main
tere har sawaal ka jawaab hun main...

par aksar darmiyaan
ek sheeshe si deewaar
bijli si kondh jaati hai
jo achanak hi
tujhe mujhe door kiye jaati hai..
aisa lagta hai ki tu hai
hokar bhi nahi hai
ek saya hai jise
main dekhte hue bhi
chhoo nahi paati hun...

nazdeekiyon ke
yeh faansle bhi
chubhte hain aksar..!!

..deep

kuch triveni

kahin chhup jau aur chupke se ro lu
koi deewar mile to aanchal bhigo lu

dosto ki kami si ho gayi hai aaj kal...!!

कहीं छुप जाऊ और चुपके से रो लूँ
कोई दीवार मिले तो आँचल भिगो लूँ

दोस्तों की कमी सी हो गयी है आज कल... !!
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khalish si hai ke dil ke kisi kone mein
maza nahi aata ab to mil ke rone mein

aey gham ab tu unke ghar ja ke reh..!!

खलिश सी है के दिल के किसी कोने में
मज़ा नहीं आता अब तो मिल के रोने में

ऐ ग़म अब तू उनके घर जा के रह .....!!
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mujhko mujhsa rehne de
aur tu bhi khud sa hi reh

fir dono milkar naya rang banayenge...!!

मुझको मुझसा रहने दे
और तू भी खुद सा ही रह

फिर दोनों मिलकर नया रंग बनायेंगे...!!
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dekhe yeh nazdeekiyan ab kya rang dikhayengi
poore honge khwaab ya fir kayamat dhaayengi

bichhad ke milne ka tajurba nahi hai na..!!

देखें येः नजदीकियां अब क्या रंग दिखाएंगी
पूरे होंगे ख्वाब या फिर कोई कयामत ढायेंगी

बिछड़ के मिलने का तजुर्बा नहीं है न..!!
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saare gham mere daaman mein aake baha jata hai
shayad yahi pyaara sa rishta dosti kehlata hai..

kabhi kabhi sochti hu mere baad uska kya hoga???

सारे ग़म मेरे दामन में आके बहा जाता है
शायद यही प्यारा सा रिश्ता दोस्ती कहलाता है..

कभी कभी सोचती हूँ मेरे बाद उसका क्या होगा???====================================


..Deep

October 7, 2008

Meri tasveer ke tukde-2

meri tasveer ke tukde utha kyun nahi leta?
agar hai ishq mujhse to bata kyun nahi deta??

hazaar khwaahishe maari to tere naam ko paaya
mere bhi naam ko tu apna kyun nahi leta??

yeh muflisi ke din hain tere bhi paas mauka hai
tu apna daaman mujhse bacha kyun nahi leta??

mera kasur hai ki tujhse bepanah ishq hai
mujhe tu mere zurm ki saza kyun nahi deta??

aji naseeb se milte hain pal mohabbat ke
tu bhi is hasin mausam ka maza kyun nahi leta??

tujhe manzur kyun hai mujhpe nazar pade jahan ki
apni amanat ko dil mein chhupa kyun nahi leta??..!!!!
========================================

मेरी तस्वीर के टुकड़े उठा क्यूँ नही लेता?
अगर है इश्क़ मुझसे तो बता क्यूँ नही देता??

हज़ार ख्वाहिशे मारी तो तेरे नाम को पाया
मेरे भी नाम को तू अपना क्यूँ नही लेता??

यह मुफ़लिसी के दिन हैं तेरे भी पास मौका है
तू अपना दामन मुझसे बचा क्यूँ नही लेता??

मेरा कसूर है की तुझसे बेपनाह इश्क़ है
मुझे तू मेरे ज़ुर्म की सज़ा क्यूँ नही देता??

अजी नसीब से मिलते हैं पल मोहब्बत के
तू भी इस हसीं मौसम का मज़ा क्यूँ नही लेता??

तुझे मंज़ूर क्यूँ है मुझपे नज़र पड़े जहाँ की
अपनी अमानत को दिल में छुपा क्यूँ नही लेता??..!!!!


.Deep

मेरी तस्वीर के टुकड़े-1

मेरी तस्वीर के टुकड़े उठा क्यूँ नहीं लेता?
अगर है इश्क मुझसे तो बता क्यूँ नहीं देता?..

मेरी तकलीफ पे रोना तुझे क्यूँ आ गया, ए दोस्त
छलक न जाए कहीं दर्द, छुपा क्यूँ नहीं लेता?..

इतनी शिद्दत भरी निगाह से जो देखता है तू
इतनी कुरबत है तो हाथ बढा क्यूँ नहीं देता?

मुझे पता है मोहब्बत तुझे भी है मुझसे
मुझे तू अपनी बाहों में पनाह क्यूँ नहीं देता?

ये झूठे लोग छलनी कर रहे हैं तेरे दिल को फिर
मेरे एहसास की तू कोई दवा क्यूँ नहीं लेता?

तू जानता है मैं इस जहाँ सी नहीं हूँ फिर
ये डर अपने ज़हन से हटा क्यूँ नहीं देता?

तेरे ही सामने टूटूंगी तब क्या चैन आएगा
चाहकर भी मुझे तू अपनी रजा क्यूँ नहीं देता?

मैं रोज़ महफिलें सजा के उजाड़ देती हूँ
मेरी मन्नत की आबरू बचा क्यूँ नहीं लेता?

मेरा हर ख्वाब तुझसे है तू जानता है
दुआ में सिर्फ तू ही है तू जानता है
मैं इंतज़ार में मर जाउंगी तेरे
तू आके मुझको जीने का सबब क्यूँ नहीं देता???


---कृति---

September 25, 2008

pyaar...


september ki
woh meethi meethi garmiyon mein
sar ke neeche
do takiye lagaye
aur aankhon pe
rumaal rakhe
jab tum apni mohabbat ke
kisse sunaya karte the
aur main aakhon mein
un kisso ko jiya karti thi..
aur batao.. batao na..
phir kya hua??
yeh kaise.. aur woh kaise hua??
main hazaar safhe palat palat ke
tumse sawaal karti
aur tum yun hi
aankhon par rumaal rakhe
mere saare sawaalon ka
jawaab dete..
main tumse aksar puchti
pyaar kya itna khoobsurat hota hai???
is par tum muskura kar
aankhon se rumaal hata kar
meri hatheli par rakhkar kehte
jab khud pyaar karogi to jaan jaogi....
aur uth kar chale jaate...

ek din
tum yun hi chale gaye..
aur main
bata bhi na paayi
ki main tumse pyaar karti hun
aur haan..!
pyaar sach meinbahut khoobsurat hota hai.....!!
=================================================
सितंबर की
वो मीठी मीठी गर्मियों में
सर के नीचे
दो तकिये लगाए
और आँखों पे
रुमाल रखे
जब तुम अपनी मोहब्बत के
किससे सुनाया करते थे
और मैं
आखों में
उन क़िस्सो को जिया करती थी..
और बताओ.. बताओ ना..
फिर क्या हुआ??
यह कैसे.. और वो कैसे हुआ??
मैं
हज़ार सफ़हे पलट पलट के
तुमसे सवाल करती
और तुम यूँ ही
आँखों पर रुमाल रखे
मेरे सारे सवालों का जवाब देते..
मैं तुमसे अक्सर पूछती
प्यार क्या इतना खूबसूरत होता है???
इस पर तुम मुस्कुरा कर
आँखों से
रुमाल हटा कर
मेरी हथेली पर रखकर कहते
जब खुद प्यार करोगी तो जान जाओगी....
और उठ कर चले जाते...

एक दिन
तुम यूँ ही चले गये..
और मैं बता भी ना पाई
कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ
और हाँ..!
प्यार सच में बहुत खूबसूरत होता है.....!!


..
Deep

September 21, 2008






आदमियों के शहर में आदमी ढूंडती हूँ

मैं ज़िंदा हूँ मगर ज़िंदगी ढूंडती हूँ


इंसानियत के टुकड़े क़ुरान मे समेटे

काफिरों की बस्ती में बंदगी ढूंडती हूँ


इस हाल में तो बेहतर बेहोश हो जाऊँ

होश वालो की भीड़ में बेखुदी ढूंडती हूँ


इस इल्म की बस्ती में हर शक्स समझदार है

खुदा के बन्दों में मैं खुदी ढूंडती हूँ


ऐ दोस्त मेरे सोखता दिल की खबर ले ले टुक

मौत के घर में अक्सर ज़िंदगी ढूंडती हूँ॥




kriti

September 20, 2008

yeh meri dilli nahi hai...!!!!

yeh kaun sa manzar hai
yeh kaisa mausam hai
har aur bikhri dehshat
yeh sach hai ya bhram hai??

yeh dil hai hindustaan ka
ya koi bikhra makaa'n hai
cheekho aur hahakaar se
bhar gaya aasmaa'n hai...

insaaniyat ke dushman
kyun kha gaye aman ko
na-munsib cheezo ke liye
dasne lage vatan ko...
zamee'n ke tukdo ne
banayabhai bhai ko dushman
yeh kaisa kalyun aaya
kya hua ghar ka chain-o-aman...

jahan basti thi har su shaanti
yeh woh zameen nahi hai
yeh meri dilli nahi hai
yeh meri dilli nahi hai...

jago siyasatdaaro
yeh apna hi chaman hai
har phoool jo kuchla ja raha
raunak-e-gulshan hai...

mat yun ujaado sabko
apne matlab ke vaaste
mat mulk ke tukde karo
jaat aur dharam ke naam pe...

aatankwaad ke jakhm ka
dard ab saha nahi jaata
yeh behta khoon insaaniyat ka
ab dekha nahi jaata..

jab maa ke sab bacche
uske liye baraabar hain
to kyun yeh khoon kharaaba
faila har dagar hai..

sehma sa har chehra hai
khoyi si har nazar hai
kyunkar yeh ho raha hai??
jab insaa'n hain sab
koi mandir ko
koi masjid ko
kyun ro raha hai???


---kriti---

September 10, 2008

मैंने ॐ को पाया है .....!!


लोग कहते हैं कि

मैं ॐ हूँ

ओंकार जो सृष्टि का रचियता

तथा पालनकर्ता है

जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है

प्रत्येक समय जो हमको

देख रहा है

सुन रहा है

हमारी प्रत्येक गतिविधि पर

जिसकी दृष्टि परस्पर बनी हुई है

वेः परमपिता परमात्मा मैं स्वयं हूँ

इसी तथ्य के ज्ञान को

ही ब्रह्मज्ञान कहते हैं

जो संसार का इश्वर है

मैं वही हूँ

वो कहते हैं

मैं स्वयं भगवान् हूँ

परन्तु

इस तथ्य से मैं अनजान हूँ

जिस क्षण मैं इस तथ्य को समझ जाउंगी

उसको पा लूंगी, स्वयं ॐ हो जाउंगी…

और इसी ओंकार को पाने के लिए

मुझे उसकी तलाश करनी होगी

उसे खोजना होगा

उसे पाना होगा..

तभी मुझे ब्रह्मज्ञान कि प्राप्ति होगी

अन्यथा मेरी मुक्ति असंभव है…


परन्तु

मैं इस बात से संपूर्ण सहमत नहीं हूँ

मैं इश्वर का अंश हूँ

स्वयं इश्वर नहीं

मुझे यह अभिमान नहीं चाहिए

यदि यह ही ब्रह्मज्ञान है

तो ऐसा ज्ञान नहीं चाहिए…


जहाँ तक बात है उसे पाने की

तो वेः मुझसे अलग भी नहीं हैं

हाँ वो मेरे साथ है सदेव

उसे खोजने, उसे प्राप्त करने को

जानने को, पहचानने को

मैं कहीं और क्यूँ जाऊँ??

जबकि वोः मेरे भीतर ही सदेव व्याप्त है॥

जब जब मैंने उसे सच्चे हृदय से पुकारा है

उसे अपने बहुत पास पाया भी है

जब जब उसमे गुम होना चाहा है

भीतर के शून्य में

मैंने ॐ को पाया है

मैंने ॐ को पाया है .....!!



--kriti--