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तेरी याद आये तो मैं रो पडूँ, जो मैं रो पडूँ तो ग़ज़ल कहूँ
तेरे दर्द को मैं बहर कहूँ, तेरे पाक मस* को ग़ज़ल कहूँ..
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मेरे घर में है तू बसी हुई, किसी शेय से है तू जुदा नहीं
तुझे खुद से कैसे जुदा करूँ, जो जुदा करूँ तो ग़ज़ल कहूँ..
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मैंने ज़िन्दगी तेरे नाम की, मेरी जीस्त* का हांसिल है तू
तुझे भूलने की दुआ में जो न असर करे वो ग़ज़ल कहूँ..
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मेरे हर्फ़ हर्फ़ ओ मेरा सुखन, तेरे दम से है तुझे क्या पता
तुझे गर शुमार* न कर सकूँ, बता कैसे मैं वो ग़ज़ल कहूँ..
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तेरे बिन सनम जो मैं जी रहा, बड़ा बेवफा, है मेरी सजा
मेरा साथ ना दे जुबां मेरी, मैं ना कह सकूँ, जो ग़ज़ल कहूँ..!!
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* mas : sparsh/ ehsaas
zeest: zindagi
shumaar : shaamil
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Deep















